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उदार हृदय वाले सज्जन बिना : किसी स्वार्थ या अपेक्षा के दूसरों का हित करते रहते हैं : पीएम मोदी

Jagbhan Yadav

Fri, Aug 7, 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सुभाषित साझा किया है। उन्होंने संस्कृत के श्लोक के माध्यम से बिना स्वार्थ के परोपकार करने की बात कही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर पोस्ट किया, “किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमुदावबोधनम्। स्वभाव एवोन्नतचेतसां सतां परोपकारव्यसनं हि जीवितम्॥” इस श्लोक का हिंदी अर्थ है, “चंद्रमा किसी प्रत्युपकार की इच्छा से अपनी किरणों द्वारा कमुदुनी को प्रकाशित नहीं करता, अपितु यह उसका स्वाभाविक गुण है। उसी प्रकार महान और उदार हृदय वाले सज्जन बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के दूसरों का हित करते रहते हैं, क्योंकि परोपकार उनके स्वभाव में होता है।”

इसके पहले गुरुवार को प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा था, “विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्। शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥” इस श्लोक का हिंदी अर्थ है, “जिसमें सभी प्रकार की श्रेष्ठ वनस्पतियां और औषधियां पैदा होती हैं, वह पृथ्वी माता विस्तृत और स्थिर हो। विद्या, शौर्य, सत्य, स्नेह आदि सद्गुणों से पालित-पोषित, कल्याणकारी और सुख-साधनों को देने वाली मातृभूमि की हम सदैव सेवा करें।”

वहीं, बुधवार को प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा था, “आत्मिक विकास व्यक्ति के भीतर सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की भावना का संचार करता है। इसी से प्रेरित होकर आज हमारी युवा शक्ति देश को हर क्षेत्र में आगे ले जा रही है।”

इसके साथ ही श्लोक भी लिखा था, “आत्मोदयः परज्यानिर्द्वयं नीतिरितीयती। तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतायते।” इस श्लोक का हिंदी अर्थ है, “स्वयं का उत्था करना और निरंतर आगे बढ़ना ही जीवन की सच्ची नीति है। इसी ध्येय को आधार बनाकर गुणी और विद्वान लोग अपने ज्ञान, कौशल और प्रभाव का विस्तार करते हैं, ताकि वे समाज में सकारात्मक योगदान दे सकें।”

इससे पहले, मंगलवार को प्रधानमंत्री की ओर से एक्स पर लिखा गया था, “निरंतर प्रयास और साधना से हमारी प्रतिभा और निखरती है। आज हमारे युवा इन्हीं गुणों को आत्मसात कर दुनियाभर में देश का नाम रोशन कर रहे हैं।”

उन्होंने एक संस्कृत श्लोक, “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति॥” साझा किया था। इस श्लोक का हिंदी अर्थ है कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। कर्मयोग या साधना के द्वारा जिसका अंतःकरण भली-भांति शुद्ध हो गया है, वह साधक समय आने पर उस परम ज्ञान को अपने आप ही अपने भीतर आत्मा में अनुभव कर लेता है।

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