: आपकी बात, गठबंधन राजनीति का लोकतंत्र पर क्या असर पड़ रहा है?
Sun, Feb 11, 2024
पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं। पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।
आपकी बात, गठबंधन राजनीति का लोकतंत्र पर क्या असर पड़ रहा है?
निश्चित समय तक गठबंधन दल रहें साथकिसी भी राजनीतिक दल को बहुमत न मिलने की स्थिति में एक से ज्यादा दल मिलकर गठबंधन सरकार बना तो लेते हैं किन्तु इन दलों की विचारधाराएं आंशिक रूप से ही समान होती हैं। जब तक इन दलों के स्वार्थसिद्ध होते रहते हैं, तब तक गठबंधन सरकार चलती है। जब किसी मुद्दे पर टकराव की स्थिति बनती है तो सरकार टूट जाती है। पुन: नया गठबंधन होता है फिर चुनाव होते हैं। गठबंधन में शामिल दलों को निश्चित अवधि तक साथ रहने की शर्त भी मंजूर करनी चाहिए। गठबंधन सरकारें प्रजातंत्र का मान सम्मान भूल कर मनमानी को महत्त्व देती हैं।
मुकेश भटनागर, भिलाई, छत्तीसगढ़
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विकास पर पड़ता है असर
देश में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की बाढ़ सी आ गई है। ऐसे में कई बार एक दल को बहुमत नहीं मिलता। कुछ दल मिलकर गठबंधन सरकार बनाते हैं। यह भी सत्य है कि विपरीत विचारधारा के दल ज्यादा दिनों तक साथ में रह कर काम नहीं करते हैं। नतीजा सरकारें बनती बिगड़ती रहती हैं। इससे देश की आर्थिक स्थिति पर तो प्रभाव पड़ता ही है, साथ ही विकास कार्यों में भी बाधा आती है। अच्छा हो यदि केन्द्रीय राजनीति में दो दलीय राजनीतिक व्यवस्था को लागू किया जाए।
-हुकुम सिंह पंवार, इन्दौर
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लोकतंत्र का अपमान
यदि ईमानदार नजरिए से देखा जाए तो आज की राजनीति लोकतंत्र की धज्जियां ही उड़ रही हैं। गठबंधन राजनीति में तो लोकतंत्र को बहुत नुकसान हो रहा है। गठबंधन राजनीति में लोकतंत्र अपमानित होता है।
प्रदीप माथुर, अलवर
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क्षेत्रीय दलों का गलत रवैया
गठबंधन की राजनीति का लोकतंत्र पर अच्छा प्रभाव होना चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं है। वर्तमान क्षेत्रीय दल जातिवाद एवं परिवारवाद से ग्रसित हैं। वे सिर्फ अपना अस्तित्व बचाने के लिए गठबंधन करते हैं। इसका हमारे लोकतंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। -अरुण धर्मावत, जयपुर
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लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं
सत्ता प्राप्ति के लिए विभिन्न विचारधाराओं वाले राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करने में सफल तो हो जाते हैं, लेकिन उनका ध्यान सिर्फ सत्ता सुख पर रहता है, जिससे वे जनता की समस्याओं के प्रति ध्यान नहीं दे पाते है। लोकतंत्र के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है।
-डॉ. बृज बल्लभ शर्मा, सवाई माधोपुर
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जनहित रहता है दूर
गठबंधन की राजनीति का लोकतंत्र पर असर पड़ता है। अलग-अलग विचारधारा के दल मिलकर सरकार चलाते हैं तो देश-हित व लोक-हित की बातें सरकार के चिंतन से दूर होती चली जाती हैं। पूर्ण बहुमत की सरकार गठबंधन की सरकार से अच्छा प्रदर्शन करती है। - व्यग्र पाण्डे , गंगापुर सिटी
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मनमानी पर लगाम
गठबंधन सरकारों का मिश्रित असर होता है। ये अस्थिर होती हैं, निर्णय लेने में देरी होती है, उतरदायित्व का होता अभाव है। दूसरा पक्ष यह है कि ये सरकारें सर्वसमूहों का प्रतिनिधित्व करती हैं, कोई मनमानी नहीं कर पाता।
-कंचन राठौड़, जोधपुर
: आपकी बात, गठबंधन राजनीति का लोकतंत्र पर क्या असर पड़ रहा है?
Sun, Feb 11, 2024
पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं। पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।
आपकी बात, गठबंधन राजनीति का लोकतंत्र पर क्या असर पड़ रहा है?
निश्चित समय तक गठबंधन दल रहें साथकिसी भी राजनीतिक दल को बहुमत न मिलने की स्थिति में एक से ज्यादा दल मिलकर गठबंधन सरकार बना तो लेते हैं किन्तु इन दलों की विचारधाराएं आंशिक रूप से ही समान होती हैं। जब तक इन दलों के स्वार्थसिद्ध होते रहते हैं, तब तक गठबंधन सरकार चलती है। जब किसी मुद्दे पर टकराव की स्थिति बनती है तो सरकार टूट जाती है। पुन: नया गठबंधन होता है फिर चुनाव होते हैं। गठबंधन में शामिल दलों को निश्चित अवधि तक साथ रहने की शर्त भी मंजूर करनी चाहिए। गठबंधन सरकारें प्रजातंत्र का मान सम्मान भूल कर मनमानी को महत्त्व देती हैं।
मुकेश भटनागर, भिलाई, छत्तीसगढ़
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विकास पर पड़ता है असर
देश में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की बाढ़ सी आ गई है। ऐसे में कई बार एक दल को बहुमत नहीं मिलता। कुछ दल मिलकर गठबंधन सरकार बनाते हैं। यह भी सत्य है कि विपरीत विचारधारा के दल ज्यादा दिनों तक साथ में रह कर काम नहीं करते हैं। नतीजा सरकारें बनती बिगड़ती रहती हैं। इससे देश की आर्थिक स्थिति पर तो प्रभाव पड़ता ही है, साथ ही विकास कार्यों में भी बाधा आती है। अच्छा हो यदि केन्द्रीय राजनीति में दो दलीय राजनीतिक व्यवस्था को लागू किया जाए।
-हुकुम सिंह पंवार, इन्दौर
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लोकतंत्र का अपमान
यदि ईमानदार नजरिए से देखा जाए तो आज की राजनीति लोकतंत्र की धज्जियां ही उड़ रही हैं। गठबंधन राजनीति में तो लोकतंत्र को बहुत नुकसान हो रहा है। गठबंधन राजनीति में लोकतंत्र अपमानित होता है।
प्रदीप माथुर, अलवर
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क्षेत्रीय दलों का गलत रवैया
गठबंधन की राजनीति का लोकतंत्र पर अच्छा प्रभाव होना चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं है। वर्तमान क्षेत्रीय दल जातिवाद एवं परिवारवाद से ग्रसित हैं। वे सिर्फ अपना अस्तित्व बचाने के लिए गठबंधन करते हैं। इसका हमारे लोकतंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। -अरुण धर्मावत, जयपुर
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लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं
सत्ता प्राप्ति के लिए विभिन्न विचारधाराओं वाले राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करने में सफल तो हो जाते हैं, लेकिन उनका ध्यान सिर्फ सत्ता सुख पर रहता है, जिससे वे जनता की समस्याओं के प्रति ध्यान नहीं दे पाते है। लोकतंत्र के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है।
-डॉ. बृज बल्लभ शर्मा, सवाई माधोपुर
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जनहित रहता है दूर
गठबंधन की राजनीति का लोकतंत्र पर असर पड़ता है। अलग-अलग विचारधारा के दल मिलकर सरकार चलाते हैं तो देश-हित व लोक-हित की बातें सरकार के चिंतन से दूर होती चली जाती हैं। पूर्ण बहुमत की सरकार गठबंधन की सरकार से अच्छा प्रदर्शन करती है। - व्यग्र पाण्डे , गंगापुर सिटी
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मनमानी पर लगाम
गठबंधन सरकारों का मिश्रित असर होता है। ये अस्थिर होती हैं, निर्णय लेने में देरी होती है, उतरदायित्व का होता अभाव है। दूसरा पक्ष यह है कि ये सरकारें सर्वसमूहों का प्रतिनिधित्व करती हैं, कोई मनमानी नहीं कर पाता।
-कंचन राठौड़, जोधपुर
: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ कौशल विकास पर भी रहे ध्यान
Thu, Feb 8, 2024
देश की आर्थिक सेहत सुधरने के कई संकेत मिल रहे हैं। यह संतोष की बात है, लेकिन दूसरी ओर देश के आम आदमी के मन में कुछ दुविधाएं भी लगातार बनी हुई हैं।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ कौशल विकास पर भी रहे ध्यान
गिरीश्वर मिश्र
दिल्ली
पूर्व
कुलपति
,
महात्मा
गांधी
अंतरराष्ट्रीय
हिंदी
विश्वविद्यालय
,
वर्धा
देश
को अगले तीन दशकों के बीच यानी स्वतंत्रता की शताब्दी मनाते वक्त विकसित देशों में शुमार होने का संकल्प बहुत ही आकर्षक है। इसे लेकर आम जन भी उत्साहित नजर आ रहा है। हालांकि हालात कैसे बदलेंगे और 2047 तक दुनिया क्या रूप लेगी, इस बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। हो सकता है कि उस मुकाम तक पहुंचते-पहुंचते ‘विकसित’ का अर्थ ही बदल जाए। बहरहाल, हमारे आज के हालात जैसे हैं, उसमें सुधार की बहुत गुंजाइश है। हम जहां हैं, वह स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है।
सभी चाहते हैं कि जो है, उससे बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, न्याय, कृषि, उद्योग-धंधों की स्थिति हो और हम अच्छे प्रशासन की ओर बढ़ें। इस महत्त्वाकांक्षी कल्पना को मूर्त रूप देने की इच्छा सभी की है। इसके लिए कमोबेश सभी सक्रिय और उद्यत हैं। विश्व की पांचवी अर्थशक्ति के मुकाम पर पहुंचे भारत के आकलन को लेकर अमृतकाल में स्वर्णिम भारत का सपना आकार ले सकता है, बशर्ते हमारी क्षमता, कुशलता और कार्य-संस्कृति में उत्कृष्टता आ सके और बनी रहे।
सच कहें तो जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि सरकार और जनता दोनों के प्रयासों से ही संभव है। इन सबके बीच में गरीबी दूर करने का उद्देश्य सर्वोपरि स्वीकार किया गया है। स्वतंत्र भारत की आज तक की सभी सरकारें इसके लिए काम करती आ रही हैं और विभिन्न उपायों से लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने का प्रयास होता रहा है। वित्तमंत्री का यह ताजा बयान कि इस दिशा में काफी प्रगति हुई है और लोगों की आर्थिक दशा सुधरी है, बेहद सुकून देने वाला है।
देश की आर्थिक सेहत सुधरने के कई संकेत मिल रहे हैं और देशी-विदेशी अनेक विशेषज्ञों की भविष्यवाणी इसी तरह की हैं। दूसरी ओर सामाजिक समता , न्याय , सौहार्द और जनहित के लिए किए जा रहे प्रयासों और उपलब्धियों की जमीनी हकीकत से आम आदमी के मन में कुछ दुविधाएं भी बनी हुई हैं। इस दौरान बढ़ती महंगाई , बेरोजगारी, नौकरशाही और न्याय व्यवस्था की मुश्किलों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विकसित भारत की यात्रा में इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। विकसित भारत की कल्पना को आकार देने के लिए भौतिक संसाधन ही काफी नहीं होंगे। इसके लिए प्रशिक्षित और दक्ष मानव-संसाधन की सबसे ज्यादा जरूरत होगी। अब भारत जनसंख्या की दृष्टि से दुनिया में सबसे आगे हो चुका है। यही वजह है कि शिक्षा चाहने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। इस दृष्टि से शिक्षा के लिए प्रावधान को बढ़ाने की जरूरत होगी। आम सहमति के मुताबिक शिक्षा पर बजट में छह प्रतिशत का आवंटन होना चाहिए। इस लक्ष्य तक हम आज तक नहीं पहुंच सके हैं।
प्रस्तावित शिक्षा नीति- 2020 के प्रति वर्तमान सरकार में बड़ा उत्साह है और पिछले कुछ वर्षों में उसका प्रचार-प्रसार भी खूब हुआ है। परंतु उसके प्रावधानों को कार्य रूप में ढालने के लिए जरूरी पहल और पूंजी निवेश नहीं दिख रहा है। पूर्व विद्यालय (प्री स्कूल) से लेकर उच्च शिक्षा के स्तर तक महत्त्वाकांक्षी परिवर्तन का प्रस्ताव सामने आया है। इसमें शिक्षा की संरचना, प्रणाली, माध्यम, शिक्षक-प्रशिक्षण और पाठ्यविषयवस्तु सभी दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण परिवर्तन वांछित है। इसी तरह शिक्षा के अधिकार को मूर्त रूप देने की बात भी हुई है। इन सबके लिए अतिरिक्त आर्थिक संसाधन का निवेश अनिवार्य होगा। विकसित भारत के मुख्य सरोकार के रूप में गरीब, महिला, किसान और युवा वर्ग के विकास के लिए सरकार अपनी प्रतिबद्धता जता रही है। इनके लिए गुणवत्ता वाली शिक्षा ही आधार हो सकती है। शिक्षा जगत की जरूरतों पर अवश्य ध्यान दिया जाए।